सोमवार, 21 जून 2010

जोर तुम्हारा था बस इतना ,
अम्बर मुझसे लिपट गया था ,
गोशा --गोशा इक दरिया का ,
जैसे मुझमें पिघल गया था ।
नादान हवाओं ने छेड़े ,
तूफान न जाने फिर कितने ,
रसभीना-सा कोई बादल
भिगो -भिगो कर निकल गया था .
तपन भरी थी जितनी मन में ,
पता नहीं वो कहाँ बह गयी ,
एक़ कहानी लिखनी थी जो ,
लिखे बिना ही बहुत कह गयी ।
मन में कोई बृन्दावन था ,
किसने देखा , किसने जाना ,
एक छलकता मानसरोवर
जैसे मुझमें सिमट गया था .

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