बुधवार, 23 जून 2010

आज हमारे दिल में तेरी
धीरे -धीरे बात चलेगी
जितना अंतर - मोम गलेगा
उतनी तेरी याद घुलेगी ।
अब तक तो बस हमने तेरी
तस्वीरों में रंग भरे हैं
जब ये दिल भी चिपकेगा तो
तेरी सूरत खास लगेगी .
बहुत शीशे चुभे अक्सर ,
बहुत पत्थर लगे अक्सर ,
न मतलब था किसी से ,पर ,
बहुत मतलब लगे अक्सर ।
समेटे भी अगर हमने
ये पत्थर और शीशे सब ,
निगाहों में दमकते हैं ,
तुम्हारी रौशनी बनकर ।
जिसे तुम जिन्दगी कहते ,
हमारे पास आई कब ,
छिड़ी जो रागिनी मन में ,
सुरों से झंझनायी कब ,
इसी दुनिया में तुम भी हो ,
इसी दुनिया में हम भी हैं ,
संभल कर हम यहाँ रहते ,
मगर कुछ भी नहीं कहते ।
बहे हें अश्क भी अक्सर ,
मगर बस ओस से बिछकर ,
उन्ही की बस नमी तो है ,
उन्ही ने बस ,लिखे उत्तर .

सोमवार, 21 जून 2010

जोर तुम्हारा था बस इतना ,
अम्बर मुझसे लिपट गया था ,
गोशा --गोशा इक दरिया का ,
जैसे मुझमें पिघल गया था ।
नादान हवाओं ने छेड़े ,
तूफान न जाने फिर कितने ,
रसभीना-सा कोई बादल
भिगो -भिगो कर निकल गया था .
तपन भरी थी जितनी मन में ,
पता नहीं वो कहाँ बह गयी ,
एक़ कहानी लिखनी थी जो ,
लिखे बिना ही बहुत कह गयी ।
मन में कोई बृन्दावन था ,
किसने देखा , किसने जाना ,
एक छलकता मानसरोवर
जैसे मुझमें सिमट गया था .
हाथ का कोई दिया अब
हाथ से जलता नहीं
प्राण -वाती फूंक डाली
मोम तक गलता नहीं ।
याद आता है मुझे वो
हाथ तेरा ,हाथ में
राह कितनी भी कठिन हो
रास्ता थकता नहीं .

शुक्रवार, 18 जून 2010

नैनों में क्या है

निमिष - निमिष नैनों में क्या है
एक झील -सी प्रीत तुम्हारी
अंग -अंग पर खेल रही है
धूप तुम्हारी ,छाँव हमारी .

बुधवार, 16 जून 2010

घुमड़ते से सवालों से
उभरते से उजालों से
अभी बाकी ,बहुत बाकी
मुझे कहना ,बहुत कहना ।
वतन ये एक गजरा है
पिरोना है अगर इसको
पिरो दो फूल इसके सब
बचे ना एक भी बाकी ।
बुझे भोपाल में दीपक
अभी तक घुप अँधेरा है
अभी तक खाट टूटी है
अभी तक चुप लुटेरा है
अमेकि नाम वालों से
ओबामा -धाम वालों से
अभी बाकी ,बहुत बाकी
मुझे कहना ,बहुत कहना ।
यहाँ कोई परिंदा भी
न पर मारे कसावों -सा
समझ आया नहीं मुझको
हुआ क्या खेल नावों का ।
रहूँ में चुप ,कहाँ तक चुप
वतन तुम जागते रहना ।
दिखाना है ज़माने को
वतन की आन जिन्दा है
जतन कुछ कर दिखाने की
हमारी शान जिन्दा है
गुजरते चंद सालों से
सहे जो जख्म -भालों से
अभी बाकी ................

रविवार, 13 जून 2010

रास्ते हैं ,दिशाएं हैं

रास्ते हैं ,दिशाएं हैं
ठंडी -गरम हवाएं हैं
बारूद भरे सीने में
खामोशिओं के साये हैं
चलो मान भी लेते हैं
अब वक्त नहीं संभलेगा
दूर कहाँ तक जाना है
येही तो आजमाए हैं .