बुधवार, 16 जून 2010

घुमड़ते से सवालों से
उभरते से उजालों से
अभी बाकी ,बहुत बाकी
मुझे कहना ,बहुत कहना ।
वतन ये एक गजरा है
पिरोना है अगर इसको
पिरो दो फूल इसके सब
बचे ना एक भी बाकी ।
बुझे भोपाल में दीपक
अभी तक घुप अँधेरा है
अभी तक खाट टूटी है
अभी तक चुप लुटेरा है
अमेकि नाम वालों से
ओबामा -धाम वालों से
अभी बाकी ,बहुत बाकी
मुझे कहना ,बहुत कहना ।
यहाँ कोई परिंदा भी
न पर मारे कसावों -सा
समझ आया नहीं मुझको
हुआ क्या खेल नावों का ।
रहूँ में चुप ,कहाँ तक चुप
वतन तुम जागते रहना ।
दिखाना है ज़माने को
वतन की आन जिन्दा है
जतन कुछ कर दिखाने की
हमारी शान जिन्दा है
गुजरते चंद सालों से
सहे जो जख्म -भालों से
अभी बाकी ................

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