सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

एक-एक पल तुम्हारा हो गया है,
देखो ,कुछ तो सहारा हो गया है ,
सुबह से शाम तक जीना है मुझको ,
बिना जिये ही गुजारा हो गया है ///

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

एक हवा का झोंका भी पैगाम तुम्हारा लाया है /
सागर की लहरों पर जैसे चाँद उमड़ कर आया है /
मदमाता है , शरमाता है , ज्योतिर्मय हो जाता है /
जाने कितनी मीलों से ये ,सरक -सरक कर आया है /

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

तस्वीर बनाने वालों क्या , उसे जिलाना भी आता है ,
कुछ रंगों के परिवेशों में ,उसे सजाना भी आता है,
वो आयेगी धीमे-धीमे , वो जायेगी धीमे -धीमे ,
उसकी यादों में जी-जी कर , उसे मनाना भी आता है /
वो दुनिया में कहाँ नहीं हैं ,मेरी आँखों से मत पूछो ,
मेरी सांसों से मत पूछो ,मेरे होठों से मत पूछो ,
उसकी तस्वीरों में मैंने ,कितनी गंगा -जमुना भर दीं ,
संभल न पाया जब भी यह दिल , उसको बहलाना आता है /
हर रोज संदेशे आते हैं ,हर रोज संदेशे जाते हैं ,
मदहोशी के इस आलम में ,रेशे -रेशे हो जाते हैं ,
जज्बातों से खेलोगे तो ,हाल पता सब लग जायेगा ,
अहसासों में क्या-क्या गुजरा , उसे जगाना भी आता है /

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

तस्वीर बनाने वालों क्या , उसे जिलाना भी आता है ,
कुछ रंगों के परिवेशों में ,उसे सजाना भी आता है,
वो आयेगी धीमे-धीमे , वो जायेगी धीमे -धीमे ,
उसकी यादों में जी-जी कर , उसे मनाना भी आता है /
वो दुनिया में कहाँ नहीं हैं ,मेरी आँखों से मत पूछो ,
मेरी सांसों से मत पूछो ,मेरे होठों से मत पूछो ,
उसकी तस्वीरों में मैंने ,कितनी गंगा -जमुना भर दीं ,
संभल न पाया जब भी यह दिल , उसको बहलाना आता है /
तस्वीर बनाने वालों क्या , उसे जिलाना भी आता है ,
परिवेशों में कुछ रंगों के ,उसे सजाना भी आता है,
वो आयेगी धीमे-धीमे , वो जायेगी धीमे -धीमे ,
उसकी यादों में जी-जी कर , उसे मनाना भी आता है /

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

माना सात समंदर भी हैं ,
पार तुम्हें जो ही करने हैं ,
मुझको मंथन कर लेने दो ,
झंकार तुम्हें तो भरने ही हैं ,
अलग कहाँ तक रह पायेंगे,
देखें ,इस दुनिया में आखिर ,
जब भी कोई सपना झलके ,
श्रृंगार तुम्हें तो करने ही हैं ,
जाओ -जाओ ,जाकर कोई ,
किरन सुबह की वापस लाओ,
मेरी पलकों में फिर अपनी ,
दुनिया आकर नई बसाओ /
मैं दुनिया में सिर्फ तुम्हारी ,
उजियाली फिर दूंद रहा हूँ /
माना सात समंदर भी हैं ,
पार तुम्हें जो ही करने हैं ,
मुझको मंथन कर लेने दो ,
झंकार तुम्हें तो भरने ही हैं ,
इन डूबी-डूबी शामों में,
सूने-सूने भुजपाशों में ,
तुमको अबतक दूंद रहा हूँ ,
तुमसे क्या -क्या पूछ रहा हूँ /
जाओ -जाओ ,जाकर कोई ,
किरन सुबह की वापस लाओ,
मेरी पलकों में फिर अपनी ,
दुनिया आकर नई बसाओ /
मैं दुनिया में सिर्फ तुम्हारी ,
उजियाली फिर दूंद रहा हूँ /